Posts

Showing posts from February, 2026

चाहिये आशिष माधव नम्र गुरुवर प्रार्थना

  चाहिये आशिष माधव नम्र गुरुवर प्रार्थना ॥धृ॥ देव इंगित पर तुम्हारे ध्येय पथ पर बढ रहे हैं आपसे ज्योतित अनेकों दीप अविचल जल रहे हैं राष्ट्र जीवनका गहन तम शीघ्र ही मिटकर रहेगा मातृमंदिर में विभूषित दिव्य तव आराधना ॥१॥ संकटोंसे पूर्ण पथ पर पुण्य स्मृति तव मार्गदर्शक फूल होंगे शूल सारे मित्र होंगे सब विरोधक दीजिये वर शक्ती ऋषिवर बढ सके पथ पर निरन्तर कर सके साकार गुरुवर आपकी हम कल्पना ॥२॥ शत्रु को भी जीतता था आपका चारित्र्य उज्वल निन्दकोंपर मात करता आपका व्यवहार निर्मल मातृभू की वेदना जो आपके उर में बसी थी पा सके अल्पांश भी तो पूर्ण होगी साधना ॥३॥ पूज्य केशव थे भगीरथ साथ लाये संघ धारा इष्ट उनकों मान तुमने भाग्य भारतका सँवारा लक्ष की द्रुत पूर्ती हो हम माँगते आशिष तुमसे कर सके हम शीघ्र पूरी मातृभूकी अर्चना ॥४

निर्माणों के पावन युग में

    निर्माणों के पावन युग में निर्माणों के पावन युग में हम चरित्र निर्माण न भूलें  स्वार्थ साधना की आंधी में वसुधा का कल्याण न भूलें ।।धृ ०।। माना अगम अगाध सिंधु है संघर्षों का पार नहीं है किन्तु डूबना मझधारों में साहस को स्विकार नही है जटिल समस्या सुलझाने को नूतन अनुसन्धान न भूलें ।।१।। शील विनय आदर्श श्रेष्ठता तार बिना झंकार नही है शिक्षा क्या स्वर साध सकेगी यदि नैतिक आधार नहीं है कीर्ति कौमुदी की गरिमा में संस्कृति का सम्मान न भूले ।।२।। आविष्कारों की कृतियों में यदि मानव का प्यार नही है सृजनहीन विज्ञान व्यर्थ है प्राणी का उपकार नही है भौतिकता के उत्थानों में जीवन का उत्थान न भूलें ।।३।

जिस दिन सोया राष्ट्र जगेगा

जिस दिन सोया राष्ट्र जगेगा जिस दिन सोया राष्ट्र जगेगा , दिस  दिस फैला तमस हटेगा ।।धृ ०।। भारत विश्व बंधु का गायक भारत मानवता का नायक सदियों से था , युगों रहेगा ।।१।। वैभवशाली जब हम होंगे , नहीं किसी से हम कम होंगे क्यों ना फिर गंतव्य मिलेगा ।।२।। हम सबकी तो राह एक है , कोटि हृदय और भाव एक हैं , बात हमारी विश्व सुनेगा ।।३।।

शत नमन माधव चरण मे

  शत नमन माधव चरण मे ॥धृ०।। आप की पीयुष वाणी शब्द को भी धन्य करती आप की आत्मियता थी युगल नयनों से बरसती और वह निश्चल हँसी जो गुंज उठती थी गगन मे ॥१।। ज्ञान मे तो आप ऋषिवर दीखते थे आद्य शंकर और भोला भाव शिशु सा खेलता मुख पर निरन्तर दीन दुखियो के लिये थी द्रवित करुणाधार मन मे ॥२।। दु:ख सुख निन्दा प्रशंसा आप को सब एक ही थे दिव्य गीता ज्ञान से युत आप तो स्थितप्रज्ञ ही थे भरत भू के पुत्र उत्तम आप थे युगपुरुष जन मे ॥३।। सिन्धु सा गम्भीर मानस थाह कब पाई किसीने आगया सम्पर्क मे जो धन्यता पाई उसीने आप योगेश्वर नये थे छल भरे कुरुक्षेत्र रण मे ॥४।। मेरु गिरि सा मन अडिग था आप ने पाया महात्मन त्याग कैसा आप का वह तेज साहस शील पावन मात्र दर्शन भस्म कर दे घोर षड रिपु एक क्षण मे ॥५।।

शून्य से एक शतक बनते, अंक की मनभावना

शून्य से एक शतक बनते, अंक की मनभावना | भारती की जय विजय हो, ले हृदय में प्रेरणा | कर रहे है हम साधना, मातृभू आराधना ||धृ०|| दैव ने भी राम प्रभु हित, लक्ष्य था ऐसा विचारा | कंटकों के मार्ग चलकर, राम ने रावण संहारा | ताकि निष्कंटक रहे, हर देव ऋषि की साधना ||१|| ध्येयहित को एक ऋषिने, देह को दीपक बनाया | और तिल-तिल जल स्वयंने,कोटि दीपों को जलाया | ध्येयपथ पर चल पडे, ले, उर विजय की कामना ||२|| विजीगिषा का भाव लेकर,देश में स्वातंत्र्य आया | बनें समरस राष्ट्र भारत बोध यह दायित्व लाया | छल,कपट और भेद से था, राष्ट्र जन को तारना ||३|| धर्म संस्कृति है सनातन, रखें जल वायू सुहावन | पंक्ति में पीछे खडे का, उन्नयन हो नित्य भावन | राष्ट्र का उत्थान साधन, विश्वमंगल कामना ||४|

वसुन्धरा परिवार हमारा

                   वसुन्धरा परिवार हमारा हिन्दु का यह विशाल चिन्तन इस वैश्विक जीवन दर्शन से मानव जाती होगी पावन ॥दृ॥ अखिल विश्व के पथदर्शन की मुनिजन सन्तोकी अभिलाषा बन्धुभाव से सब जग जोडे वेद और गीता की भाषा समरसता मन्त्र के नाद से हम भर देंगे सारा त्रिभुवन ॥१॥ जड इहवादी तत्वज्ञान को पराभूत होते देख रहे भक्तिसहित कर्तुत्व चढाकर पूजा चैतन्य की कर रहे सदा विजय कर्तव्य धर्म का स्वतन्त्रता का मुख मे गायन ॥२॥ व्यक्ती व्यक्ती सब विलीन होकर समाज जीवन नित कुसुमित हो सर्वस्वार्पण के कल्पतरु नव फल फूलोंसे शोभित हो काल बाह्य सब छोड बनाये भविष्य अपना दिव्य चिरन्तन ॥३॥ आकांक्षा प्राचीन हमारी नवयुग की गा रही आरती त्रिकाल विजयी संकल्पोंकी नवपुरुषार्थ करेगा पूर्ती अखिल विश्व मे सुख शान्ती हो जनमानस का यह सन्कीर्तन ॥४॥ नव युग के नव आव्हानोंको नवसाहस से स्वीकारेंगे भूतकाल पर विजय प्राप्त कर नव विक्रमध्वज लहरायेंगे विश्व धर्म का अमृत देंगे आर्त जगत का यह संजीवन ॥५॥

आज पूजा की घड़ी है

आज पूजा की घड़ी है आज पूजा की घड़ी है॥ साधना के शूलमय पथ  पर सदा सबको बढ़ाता ध्येय की धुन धमनियों में  फूँकता युग क्रान्ति लाता हर फड़क में राष्ट्र के  उत्थान की आशा भरी है ॥ आज पूजा की घड़ी है॥१॥ सूर्य की पहली छटा की  अग्नि का है वास इसमें पूर्वजों की यह पताका  विजय का विश्वास इसमें कोटि ह्रदयों के मिलन की  भावना इसमें जुडी है। आज पूजा की घड़ी है ॥२॥ राष्ट्र का निर्माण पोषण  वृध्दि है इसकी कहानी आन पर बलिदान की है  प्रेरणामय यह निशानी राष्ट्रपुरुषों की चिरंतन  कल्पनाओं की कड़ी है। आज पूजा की घड़ी है ॥३॥ इस ध्वजा से श्रेष्ठ जीवन  का अमर संदेश पावें औंर लाखों प्राण इंगित  माथ पर इसके चढ़ावें फिर सफलता हाथ जोड़े  सामने मानो खड़ी है। आज पूजा की घड़ी है ॥४॥

विश्व गुरु तव अर्चना मे भेट अर्पण क्या करे

विश्व गुरु तव अर्चना मे भेट अर्पण क्या करे जब कि तन मन धन तुम्हारे, और पूजन क्या करे ॥ध्रु॥ प्राची की अरुणिम छटा है, यज्ञ की आभा विभा है अरुण ज्योतिर्मय ध्वजा है, दीप दर्शन क्या करे ॥१॥ वेद की पावन ऋचा से आज तक जो राग गूंजे  वन्दना के इन स्वरो मे तुच्छ वन्दन क्या करे ॥२॥ राम से अवतार आये कर्ममय जीवन चढाये अजिर तन तेरा चलाये और अर्चन क्या करे ॥३॥ पत्र फल और् पुष्प जल से भावना ले हृदय तल से प्राण के पल पल विपल से आज आराधन करे॥४॥

मैं स्वयंसेवक मुझे, न चाह हे जयगान की

मैं स्वयंसेवक मुझे, न चाह हे जयगान की । मैं स्वयंसेवक मुझे, न चाह हे जयगान की । मैं स्वयंसेवक मुझे, परवाह न यशगान की । मैं पूजा का पुष्प हूँ, आराध्य माता भारती । मैं स्वयंसेवक मुझे .... परम मंगलवत्सला माँ, गोद मे जिसकी पला मैं-२ जिस धरा के अन्न-जल से, नित्यप्रतिपल हूं बढ़ा मैं । प्राणदीप से मैं उतारू-२ , उस धरा की आरती ...। । मैं स्वयंसेवक मुझे ...॥१॥ धर्मपथ पे मैं चला हूं, अटल यह विश्वास मेरा -२ सुजन रक्षण असुर मर्दन, श्रेष्ठ जीवन कार्य मेरा । धर्म हित महायुद्ध को हे-2, माँ मुझे ललकारती । । मैं स्वयंसेवक मुझे ....॥२॥ अग्निपथ पर मैं चला हूं, छोड़ सुखमय मार्ग जग का-२ कण्टको से पूर्ण पथ पर, नित्य हे स्वीकार चलना श्रेष्ठतम बलिदान की-२, हे मातृभू अधिकारी । मैं स्वयंसेवक मुझे ....॥३॥ ना रहे कुछ भिन्नता अब, बन सकूं मैं अंश तेरा-२  बिंदुबनकर संघसरिता, कर सकूं अभिषेक तेरा । तव चरण पर वन्दना-२, स्वीकार हे माँ भारती । । मैं स्वयंसेवक मुझे ....॥४॥ मैं स्वयंसेवक मुझे, न चाह हे जयगान की । मैं स्वयंसेवक मुझे, न चाह हे जयगान की । मैं स्वयंसेवक मुझे, परवाह न यशगान की । मैं पूजा का पुष्प हूँ, आराध्य ...

हमें वीर केशव मिले आप जबसे, नयी साधना की डगर मिल गयी है

हमें वीर केशव मिले आप जबसे, नयी साधना की डगर मिल गयी है ॥ध्रु॥ भटकते रहे ध्येय-पथ के बिना हम, न सोचा कभी देश क्या, धर्म क्या है? न जाना कभी पा मनुज-तन जगत में, हमारे लिए श्रेष्ठतम कर्म क्या है? दिया ज्ञान मगर जबसे आपने है, निरंतर प्रगति की डगर मिल गई है ॥१॥ समाया हुआ घोर तम सर्वदिक था, सुपथ है किधर कुछ नहीं सूझता था । सभी सुप्त थे घोर तम में अकेला, ह्रदय आपका हे तपी जूझता था । जलाकर स्वयं को किया मार्ग जगमग, हमें प्रेरणा की डगर मिल गई है ॥२॥ बहुत थे दुखी हिन्दू निज देश में ही, युगों से सदा घोर अपमान पाया । द्रवित हो गए आप यह दृश्य देखा, नहीं एक पल को कभी चैन पाया । ह्रदय की व्यथा संघ बनकर फूट निकली, हमें संगठन की डगर मिल गई है ॥३॥ करेंगे हम पुनः सुखी मातृ-भू को, यही आपने शब्द मुख से कहे थे । पुनः हिन्दू का हो सुयश गान जग में, संजोए यही स्वप्न पथ पर बढ़ रहे थे । जला दीप ज्योतित किया मातृ-मंदिर, हमें अर्चना की डगर मिल गई है ॥४॥ हमें वीर केशव मिले आप जबसे, नयी साधना की डगर मिल गयी है ॥

अब तक सुमनों पर चलते थे अब काँटो पर चलना सीखें

अब तक सुमनों पर चलते थे  अब काँटो पर चलना सीखें ॥ खडा हुवा है अटल हिमालय  दृढता का नित पाठ पढाता बहो निरन्तर ध्येय सिन्धु तक  सरिता का जल कण बतलाता अपने दृढ निश्चय से पथ की  बाधाओं को ढहना सीखे ॥१॥ अपनी रक्षा आप करे जो  देता उसका साथ विधाता अन्यों पर अवलम्बित है जो  पग पग पर वह ठोकर खाता जीवन का सिद्धान्त अमर है  उस पर हम नित चलना सीखें ॥२॥ हम में चपला सी चंचलता  हम में मेघों का गर्जन है हम में पूर्ण चन्द्रमा चुम्बी  सिन्धु तरंगों का नर्तन है सागर से गंभीर बने हम  पवन समान मचलना सीखें ॥३॥ उठे उठे अब अन्धःकारमय  जीवन पथ आलोकित कर दे निविद निशा के गहर तिमिर को  मिटा आज जग ज्योतित कर दे तिल तिल कर अस्तित्व मिटा दे  दीपशिखा सम जलना सीखे ॥४॥

दशो दिशाओ मे जायें दल बादल से छा जाये

दशो दिशाओ मे जायें दल बादल से छा जाये उमड घुमड कर हर धरती पर नंदनवन सा लहराये ॥ध्रु॥ ये मत समझो किसी क्षेत्र को खाली रह जाने देंगे दानवता की बेल विषैली कही नही छाने देंगे जहाँ कही लू झुलसाती अमृत  रिमझिम बरसाये ॥१॥ फूल सुकोमल धरती पर हम बिजली नही गिराते है किंतु अडीले बालु टीले वर्षा मे ढह जाते है ध्वंस हमारा काम नही अविरल जीवन सरसाये ॥२॥ मानव जीवन की स्वतंत्रता नष्ट नही होने पाये यंत्र व्यवस्था हृदयहीन  मे स्वत्व नही खोने पाये जीवनस्तर का अर्थ न हम भोग डगर मे भरमाये ॥३॥ देश देश के जीवन दर्शन,  अनुभव कहता पूर्ण नही आदिसृष्टि से हिन्दुधर्म की,  पूर्ण धर्म उपलब्धि रही  ज्ञान किरण फिर प्रकटाये, शांती व्यवस्था समझाये ॥४॥

ओ विजय के पर्व, पौरुष का प्रखर सूरज उगा दे

ओ विजय के पर्व, पौरुष का प्रखर सूरज उगा दे पार्थ के गांडीवधारी,  हाथ का कंपन छुडा दे  पाँव  मे स्वातंत्र्य के क्यों  हिचकिचाहट आ समाई  क्यों नवल तारुण्य मे निर्वीर्यता देती दिखायी आज रग रग में लहू का , खौलता तूफान ला दे ॥१॥ ओ विजय के पर्व, पौरुष का प्रखर सूरज उगा दे....   शत्रुओं की शक्ति को  हम  हीन हो कर आँकते है आँख के आगे भला क्यों  भूत भय के नाचते है आज रग रग में लहू का , खौलता तूफान ला दे ॥२॥  ओ विजय के पर्व, पौरुष का प्रखर सूरज उगा दे....   पीठ पर अरिवृन्द चढते आ रहे है आज हँसते  ओ ब्रुहद्रथ की अहिंसा जा तुझे अन्तिम नमस्ते  आज रग रग में लहू का , खौलता तूफान ला दे ॥३॥ ओ विजय के पर्व, पौरुष का प्रखर सूरज उगा दे   गिरि अरावलि की शिलाओ अब हिमालय पर चलो तुम आज हिम के वक्ष पर चित्तौड के जौहर जलो तुम  चीन की प्राचीर पर तो,  टाप चेतक की अडा दे ॥ ४॥  ओ विजय के पर्व, पौरुष का प्रखर सूरज उगा दे....

उठो जवानो हम भारत के स्वाभी मान सरताज है

उठो जवानो हम भारत के स्वाभी मान सरताज  है अभिमन्यु के रथ का पहिया, चक्रव्यूह की मार है चमके कि ज्यों दिनकर चमका है उठे कि ज्यो तूफान उठे चले चाल मस्ताने गज सी हँसे कि विपदा भाग उठे हम भारत की तरुणाई है माता की गलहार है अभिमन्यु के रथ का पहिया.... खेल कबड्डी कहकर पाले में न घुस पाये दुश्मन प्रतिद्वंदी से ताल ठोक कर कहो भाग जाओ दुश्मन मान जीजा के वीर शिवा हम राणा के अवतार है अभिमन्यु के रथ का पहिया.... गुरु पूजा में एकलव्य हम बैरागी के बाण है लव कुश की हम प्रखर साधना शकुंतला के प्राण है चन्द्रगुप्त की दिग्विजयों के हम ही खेवनहार है अभिमन्यु के रथ का पहिया.... गोरा, बादल, जयमल, फत्ता, भगत सिंह, सुखदेव, आज़ाद केशव की हम ध्येय साधना माधव बन होती आवाज  आज नहीं तो कल भारत के हम ही पहरेदार है अभिमन्यु के रथ का पहिया.... उठो जवानो हम भारत के स्वाभी मान सरताज  है अभिमन्यु के रथ का पहिया, चक्रव्यूह की मार है

विश्व में गूँजे हमारी भारती

विश्व में गूँजे हमारी भारती विश्व में गूँजे हमारी भारती जन जन उतारे आरती धन्य देश महान धन्य हिंदुस्थान ॥ध्रु॥ इस धरा की गोद में संसार को संस्कॄति मिली है । हर शिखर की धवलता इस देश की जिंदादिली है । सिंधु की हर लहर चरण पखारती नदियाँ सदा सिंगारती ॥१॥ चल दिया मानो सिकंदर इस धरा पर टेक घुटने। शत्रु की क्या जब लगेगा इस वतन का शौर्य जगने । कुपित हो जब मातृ-भूमि निहारती रण चण्डिका हुंकारती ॥२॥ विश्व का हर देश जब भी दिग्भ्रमित हो लड़खड़ाया । लक्ष्य की पहचान करने इस धरा के पास आया । भूमि यह हर दलित को पुचकारती हर पतित को उद्धारती ॥३॥

है अमित सामर्थ्य मुझमें याचना मैं क्यो करुँगा?

है अमित सामर्थ्य मुझमें याचना मैं क्यो करुँगा? रुद्र हूँ विष छोड़ मधु की कामना मैं क्यों करुँगा? इन्द्र को निज अस्थि पंजर जब कि मैंने दे दिया था। घोर विष का पात्र उस दिन एक क्षण में ले लिया था। दे चुका जब प्राण कितनी बार जग का त्राण करने। फिर भला विध्वंस की कटु कल्पना मैं क्यों करुँगा ?॥१॥ फूँक दी निज देह भी जब विश्व का कल्याण करने। झोंक डाला आज भी सर्वस्व युग निर्माण करने। जगमगा दी झोपड़ी के दीप से अट्टालिकाएँ। फिर वही दीपक तिमिर की साधना मै क्यों करुँगा ?॥२॥ विश्व के पीड़ित मनुज को जब खुला है द्वार मेरा। दूध साँपों को पिलाता स्नेहमय आगार मेरा। जीतकर भी शत्रु को जब मैं दया का दान देता। देश में ही द्वेष की फिर भावना मैं क्यों भरुँगा?॥३॥ मार दी ठोकर विभव को बन गया क्षण में भिखारी। किन्तु फिर भी जल रही क्यों द्वेष से आँखे तुम्हारी। आज मानव के ह्रदय पर राज्य जब मैं कर रहा हूँ। पिर क्षणिक साम्राज्य की भी कामना मैं क्यों करुँगा?॥४॥