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पूर्ण करेंगे हम सब केशव ! वह साधना तुम्हारी !!

  पूर्ण करेंगे हम सब केशव ! वह साधना तुम्हारी !! पूर्ण करेंगे हम सब केशव ! वह साधना तुम्हारी!! आत्म हवन से राष्ट्र्‌देव की आराधना तुम्हारी निशि दिन तेरी ध्येय - चिंतना आकुल मन की तीव्र वेदना साक्षात्कार ध्येय का हो यह मन कामना तुम्हारी पूर्ण करेंगे………………………………………………।…१ कोटी कोटी हम तेरे अनुचर ध्येय मार्ग पर हुए अग्रसर होगी पूर्ण सशक्त राष्ट्र्‌ की वह कल्पना तुम्हारी पूर्ण करेंगे……………………्र्र…………………।।२ तुझसी ज्योती हृदय में पावें कोटी - कोटी तुझसे हो जावें तभी पूर्ण हो राष्ट्र्‌देव की वह अर्चना तुम्हारी पूर्ण करेंगे…………………………………।३

शत नमन केशव चरण में

शत नमन केशव चरण में शत नमन केशव चरण में, शत नमन केशव चरण में देश में घनघोर तम था, मातृ भू की दुर्दशा थी आत्मविस्मृत हम सभी थे, कुछ न जीवन की दिशा थी घोर तम में भी तुम्हारे, स्वप्न स्वर्णिय था नयन में…………।१ तुम सखा थे बंधु तुम थे, मार्गदर्शक भी तुम्हीं थे मंत्र द्ष्टा तंत्र सृष्टा, संगठन मर्मज्ञ तुम थे आप अपनी ही कृति से, बस गये प्रत्येक मन में…………………२ देश फिर यह विश्व गुरू हो, संगठन नूतन बनाया और माधव सा विलक्षण, दिव्य था प्रतिबिंब पाया श्वास अम्तिम भी समर्पित, मातृ भू के उन्नयन में…………३ धन्य हो जीवन हमारा.., अंश भी तब पा सके जो स्वप्न जो छोडा अधूरा, पूर्ण निश्चय हम करें वो राष्ट्र्‌भक्ति को जगाने, हम बढें गिरि ग्राम वन मैं………।४

शत शत नमन भरतभूमि को, अभिनंदन भारत माँ को

 शत शत नमन भरतभूमि को,  अभिनंदन भारत माँ को जिसके रजकण मात कर रहे, मलयगिरि के चन्दन को उत्तर  में गिरिराज  हिमालय माँ का मुकुट संवारता दक्षिण में रत्नाकर  माँ  के पावन चरण पखारता बुला रही हर अज्ञानी को गीता ज्ञान सुनाने को शत शत नमन भरतभूमि को ................... ||1|| राम-कृष्ण की पावन धरती,  जो शक्ति संचार करे जन-जन में बलिदान भावना,  कूट-कूट कर नित्य भरे अर्जुन-भीम-शिवाजी जैसे, गुण निर्माण कराने को शत शत नमन भरतभूमि को ................... ||2|| इस धरती पर जन्म लिया है,  यह सौभाग्य हमारा है इस पर ही हो जीवन अर्पित,  यह संकल्प हमारा है बार-बार यह जीवन पाए,  इस पर ही बलि जाने को शत शत नमन भरतभूमि को ................... ||3||

शाखा है गंगा की धारा, डुबकी नित्य लगाते हैं

शाखा है गंगा की धारा, डुबकी नित्य लगाते है  माँ का वंदन सांझ सबेरे, श्रद्धा सुमन चढ़ाते है  संघ साधना अर्चन-पूजन प्रतिदिन शीश झुकाते है  भारत माँ के भव्य भाल पर भगवा ध्वज पहराते है  माँ का वंदन सांझ सबेरे, श्रद्धा सुमन चढ़ाते है  इसकी रज में खेल-खेल कर तन चन्दन बन जाते है  योग,खेल,रवि नमस्कार से स्वस्थ शरीर बनाते है  स्नेहभाव से मिलते-जुलते, मन-मत्सर मर जाते है  माँ का वंदन सांझ सबेरे, श्रद्धा सुमन चढ़ाते है  लोगसंगठक के संवाहक, गटनायक बन जाते है  कुंभकार की रचना करके, गणशिक्षक कहलाते है  देशभक्ति का गीत हृदय में, मातृभक्ति पनपाते है  माँ का वंदन सांझ सबेरे, श्रद्धा सुमन चढ़ाते है  मधुकर की तप साधना, वज्रशक्ति बन जायेगी  माँ बैठेगी सिंहासन पर, यश-वैभव को गायेगी  केशव-माधव का यह दर्शन, मोहजाल कट जाते है  माँ का वंदन सांझ सबेरे, श्रद्धा सुमन चढ़ाते है   शाखा है गंगा की धारा, डुबकी नित्य लगाते है  माँ का वंदन सांझ सबेरे, श्रद्धा सुमन चढ़ाते है संघस्थान मंदिर सा पावन, मन दर्पण हो जाते है 

धन्य हे युगपुरुष केशव धन्य तेरी साधना

 धन्य हे युगपुरुष केशव धन्य तेरी साधना। कोटि कंठों में समाहित राष्ट्र की आराधना॥ राष्ट्र का दिनकर छिपा छाई अमावस की निशा दासता की श्रृंखला मे भटकते हम थे दिशा चक्रव्यूह में जा फंसी थी राष्ट्र की तेजस्विता अस्मिता बाधित रही औ सुप्त सारी कामना॥ शक्ति के नव जागरण का वर्ष का शुभ दिन प्रथम प्रखर दिनकर सा उदित तुम मेटने को गहन तम मातृ भू की अर्चना का ह्रदय में संकल्प लेकर वीर विक्रम सा किए तुम विजय की प्रस्तावना॥ छत्रपति की प्रेरणा से राष्ट्र पौरुष को जगाकर शालिवाहन सा सतत नव संगठन का भाव लाकर मेंट की गत जाति भाषा प्रान्त की सब रुढ़ियाँ सुप्त हिन्दू राष्ट्र को जागृत किया कर साधना॥ स्वप्न जो उर में संजोये आज वह साकार ढलता राष्ट्र नव निर्माण का है अब आधार बनता विविध पथ से बढ़ रहे हैं ध्येय के तेरे उपासक सत्य हिगी आपकी अब चिर प्रतीक्षित कामना॥

दुःशासन की तोड़ भुजाये, पांचाली का क्लेश हरेगें

दुःशासन की तोड़ भुजाये पंचाली का शोक हरेंगे काट तमिस्रा की कारायें कण- कण में आलोक भरेंगे। हमने पहचाना है उनको  जो समाज को तोड़ रहे हैं, भारतीय चिन्तन की धारा  छल दल से जो मोड़ रहे हैं; हम अपनी संगठन शक्ति से  षडयंत्रो पर रोक करेंगे। अत्याचारी शासन में ही  भंग हुई थी मर्यादायें, करुणा की धरती पर लुटती  सत्य अहिंसा की आत्मायें हम विजिगीषु वृति के वाहक  तीक्ष्ण शरों की नोक करेंगे। हर दम्भ से दर्प दलन कर  रोपेंगे हम विजय पताका, रच देंगे अभिनव समाज  हम सत्य शील समता-ममता उच्चादर्शों की आभा से  आलोकित यह लोक करेंगे वीरवृती हम ध्येयनिष्ठ हैं  विजयशालिनी शान्ति खड़ी है, भारत माँ के श्रीचरणों में  सदा समर्पित भक्ति खड़ी है; कोटिक कंठों से उच्चारित  हिन्दु राष्ट्र का उदघोष करेंगे

मातृ चरणों मे समर्पित है युगों की साधना

  मातृ चरणों मे समर्पित है युगों की साधना।। मातृ चरणों में समर्पित है युगों की साधना सत्य नूतन यश खिले तब यह अकिंचन कामना शीश तव हिमगिरि सुशोभित पग महोदधि धो रहा नीर पावन सरित का तव पी चराचर जी रहा शस्य श्यामल भुमि प्यारी हम करें आराधना॥ १॥ जो भी आया ले लिया हर्षित उसे तू गोद में पिलाकर निज क्षीर पाला है उसे आमोद में विश्व में बेजोड तव वैशिष्टय माँ है मानना॥२॥ कठिन झंझावात में भी तू अडिग हिमवान बन है दिया जग को अपरिमित संस्कृति औ ज्ञान धन अखिल विश्वाधार औ सुख शांति की हो सर्जना॥३॥ तव चरण की धूलि पर माँ कोटिशः सिर हैं समर्पित अर्चना के दीप जननी कोटिशः हैं आज अर्पित कौन है जग में करे जो आज तव अवमानना॥४॥