ओ विजय के पर्व, पौरुष का प्रखर सूरज उगा दे

ओ विजय के पर्व, पौरुष का प्रखर सूरज उगा दे
पार्थ के गांडीवधारी,  हाथ का कंपन छुडा दे
 पाँव  मे स्वातंत्र्य के क्यों  हिचकिचाहट आ समाई
 क्यों नवल तारुण्य मे निर्वीर्यता देती दिखायी
आज रग रग में लहू का , खौलता तूफान ला दे ॥१॥
ओ विजय के पर्व, पौरुष का प्रखर सूरज उगा दे....
 
शत्रुओं की शक्ति को  हम  हीन हो कर आँकते है
आँख के आगे भला क्यों  भूत भय के नाचते है
आज रग रग में लहू का , खौलता तूफान ला दे ॥२॥ 
ओ विजय के पर्व, पौरुष का प्रखर सूरज उगा दे....
 
पीठ पर अरिवृन्द चढते आ रहे है आज हँसते 
ओ ब्रुहद्रथ की अहिंसा जा तुझे अन्तिम नमस्ते 
आज रग रग में लहू का , खौलता तूफान ला दे ॥३॥
ओ विजय के पर्व, पौरुष का प्रखर सूरज उगा दे
 
गिरि अरावलि की शिलाओ अब हिमालय पर चलो तुम
आज हिम के वक्ष पर चित्तौड के जौहर जलो तुम 
चीन की प्राचीर पर तो,  टाप चेतक की अडा दे ॥ ४॥ 
ओ विजय के पर्व, पौरुष का प्रखर सूरज उगा दे....

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